मीडिया के महंत
बड़ा ही धार्मिक देश है हमारा । अब जब देश धार्मिक है तो देशवासियों का धार्मिक होना स्वाभाविक है । अब जब देशवासी धार्मिक हैं तो टी वी की ख़बरों के दर्शक भी निश्चित तौर पर धार्मिक होने ही चाहिए , और यकीं मानिए हैं भी । और जब दर्शक धार्मिक हैं तो उनके भगवान भी पैदा होने ही चाहिए । खैर अभी तक गनीमत है कि भगवान् अवतरित नहीं हुए लेकिन देर सबेर तक हो ही जायेंगे । हालांकि इस बीच जब तक भगवान् अवतरित नहीं होते खाली जगह को भरने के लिए महंत कुछेक जरूर पैदा हो गए हैं और इसी गति से बढ़ते रहे तो कुछ दिनों बाद टी वी ख़बरों में पत्रकार कम और महंत ज्यादा होंगे ।
मीडिया के ये महंत बहुत महान हैं । अरे भाई तभी तो इनका नाम है । वैसे इस प्रजाति के महान लोग पहले के अखबारी दिनों भी पाए जाते थे और मठाधीश कहलाते थे । लेकिन तारीख गवाह है की ये बेचारे उस दौरान अखबार के अन्दर की दुनिया तक ही सिमट कर रह गए , क्योंकि उस वक़्त इनकी सुनने वालों में नए पत्रकार बनने का शौक रखने वाले सब एडिटर या कारसेवा करने वाले रिपोर्टर होते थे और एडिसन जाने के बाद दफ्तर या नज़दीक के चौराहे पर अपनी चौपाल जमाते थे बच्चों को ज्ञान देते थे और अगले दिन अपने दोस्तों को बताते थे की गुरु.......... कल अखबार समेटने के बाद सुबह चार बजे तक बैठकी जमाई । यह अखबारी तारीख का वह दौर था जब संपादकों का काम मैनेजरों ने नहीं सम्हाला था ।
खैर वक़्त का पहिया घूमा । अखबार प्रोडक्ट हो गए और सम्पादक मैनेजर , जो नहीं हो पाए वो इतिहास हो गए या खुदमुख्तार जन की सत्ता बने हुए अपनी मैयत ढो रहे हैं
खैर यहाँ बात हो रही थी महंतों की , तो वही बात करूंगा । तो उस जमाने में जो मठाधीश नहीं हो पाए अब वो नए जमाने में महंत हो रहे हैं । इन सभी के अपने अपने आश्रम हैं , असली आश्रम नहीं क्योंकि वो तो तमाम सारे बापुओं संतों ने घेर लिए । तो यह बेचारे मीडिया के महंत क्या करें ? इन्होने अपने अपने वर्चुअल आश्रम बना लिए सोसल नेटवर्किंग साईट पे । अब यह मीडिया के सर्वशक्तिमान महंत सोसल नेटवर्किंग साईट पर प्रवचन देते हैं और शिष्यों को धन्य करते हैं मजे की बात है की अपने अपने आश्रमों में ये इन ऊँचाइयों पर बैठे हैं की शिष्यों को जवाब नहीं देते हैं शिष्य अगर कुछ कहते या लिखते भी हैं तो उस पर कमेन्ट नहीं करते हैं लेकिन शिष्य कुछ ऐसे निष्ठावान हैं की महंत ने कुछ अपने स्टेटस पर कहा नहीं की सैकड़ों की तादाद में शिष्य टूट पड़ते हैं
हालाँकि खैरियत यह है की अभी यह बहुत थोड़ी मात्रा में हैं और अपना ज्यादातर इस्तेमाल अपने आपको या अपने शोज को देखने के लिए बाध्य करने में करते हैं मीडिया के ये नए महंत अपनी आरती उतरवाने में ( वर्चुअल ही सही) कोई कसर नहीं छोड़ते । ये खबरों के अन्दर ख़बर कम और अपने आप को दिखाने में कैमरे का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं
इनके शोज़ के नाम भी खुद को महिमामंडित करते हुए होते हैं । कोई साहब देश के लिए खाते है और यह बताने के लिए की इतना खाकर भी जिन्दा है , अपने नाम का "लाइव" कार्यक्रम ले के आते हैं एक दुसरे साहेब हैं अपनी रिपोर्ट ले के आते हैं , उनकी रिपोर्ट में रिपोर्ट कम, खुद उनका ज्ञान और चेहरा ज्यादा विद्यमान रहता है । लैरी किंग, जोय लेनो तो पानी भरते हैं इन साहिबान के सामने ।
अब दिक्कत ये है की जो दर्शक इनका भक्त नहीं है वो बेचारा क्या करे , या तो इनसे ज्ञान ले या दुसरे मठों में जाकर स्वर्ग की सीढी, बोलने वाला भालू , पांचवी मंजिल पर सांड या ठनाठन ठुमकों पर प्रवचन सुने देखे ।
चलो देखते हैं की जैसे अन्य महंतों और मठों पर आजकल गाज गिर रही है ऐसे में इनके मठ कब तक सलामत रहते हैं । शैशवकाल के नाम पर कब तक ख़बर चैनल घुटनों के बल चलेंगे और इन महंतों को प्रश्रय मिलता रहेगा ?
