Tuesday, 22 December 2009

एक नज़्म : पिता के लिए या शायद मेरे लिए !

तुम्हारी कब्र पर

मैं फातिहा पढने नहीं आया

मुझे मालूम था

तुम मर नहीं सकते

तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिसने उड़ाई थी

वो झूठा था

वो तुम कब थे

कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से हिल के टूटा था

मेरी आँखें

तुम्हारें मंजरों में कैद हैं अब तक

में जो भी देखता हूँ

सोचता हूँ

वो ------ वही हैं

जो तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी

कहीं कुछ भी नहीं बदला

तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में सांस लेते हैं

में लिखने के लिए जब भी कलम उठाता हूँ

तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुरसी में पाता हूँ

बदन में मेरे जितना भी लहू है

वो तुम्हारी

लार्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता है

मेरी आवाज़ में छुप कर

तुम्हारा जहन रहता है

मेरी बिमारियों में तुम

मेरी लाचारियों में तुम

तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है

वो झूठा है

तुम्हारी कब्र में मैं दफ्न हूँ

तुम मुझमें जिंदा हो

कभी फुर्सत मिले तो फातिहा पढने चले आना ।

इस वक़्त सिर्फ निदा फाजली की यह नज़्म

मिलेंगे जल्द ही और बकवास के साथ

3 Comments:

At 22 December 2009 at 10:49 pm , Anonymous Anonymous said...

isse pad kar sirf aasu bha rahi hoo.

 
At 22 December 2009 at 10:53 pm , Anonymous Anonymous said...

aansu aa gaye

 
At 28 December 2009 at 1:18 pm , Blogger Unknown said...

kul haan chachu
woh baat alag hai zayada kuch smajh nahi aaya

 

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