Tuesday, 6 April 2010

शादी की सिंफनी और चैनलों की चिल्ल पों

हम एक हैं । गलती से अलग अलग मुल्क बन गए पर एक बार फिर ये साबित हो गया की हम एक हैं । हमारी बहुत सारी चीज़ें एक सी हैं , और इस एक हफ्ते के दौरान ये भी समझ में आ गया की इस पार और उस पार हमारा मीडिया भी एक ही है । हमारा मीडिया और उनका मीडिया एक जैसे ही सोचता है , दोनों के सरोकार भी एक जैसे हैं । दोनों ही मुल्कों में भूख है गरीबी है बेरोजगारी है , लेकिन ये सब न तो हमारे मीडिया के सरोकार हैं और न ही उनके मीडिया के । फटे में टांग अड़ाने से दोनों मुल्कों के चेनलों की टी आर पी बनती है और टी आर पी के नाम पर फटे में टांग अडाते हैं और न फटा हो तो पहले फाड़ते है फिर टांग अडाते हैं ।

लेकिन उनकी बात क्यों ? हम तो तथाकथित तौर पर समझदार हैं , प्रगतिशील हैं , बड़े हैं । हमारी उम्र डेढ़ दशक की हो गई है यानि की हम किशोर हो चले हैं लेकिन अभी भी तुतला कर बोलना बंद नहीं किया , अभी भी कुल्फी वाले की घंटी सुनते ही मचलने लगते हैं खिलौने की दुकान सामने देख कर सड़क पर ही लोट लगाने लगते हैं और टी आर पी के झुनझुने पकड़ कर हिलाने लगते हैं ।

अगर इस हफ्ते दुकान में मौजूद माल की बात करें तो यक़ीनन बहुत माल था जिसको बहुत अच्छे से बेचा जा सकता था , मसलन शिक्षा का अधिकार , खाद्य सुरक्षा जैसे खिलौने दुकान में आये । महिला आरक्षण की गुडिया को फिर से नए कपडे पहना कर ताक पर रखा जा रहा है । महिला आरक्षण की गुडिया को तो भाई लोगों ने नहीं बेचा पर एक गुडिया की चंद रोज़ बाद होने वाली शादी के लिए खूब बाजा बजाया और अभी भी जारी है । अब मुझे और मेरे जैसे कम अक्ल बन्दों को यह समझ नहीं आ रहा है की ये चौबीसों घंटे के राग रागिनी वाली मौसिकी की महफ़िल में सिर्फ शादी के बेसुरे संगीत की पिपिनी ही क्यों बजाई जा है ? आप अपनी बजा रहे हैं और कह रहे हैं की सुनो , सुनना पड़ेगा , सब यही सुन रहे हैं और यही इस वक़्त की सबसे उम्दा सिम्फनी है ।

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना तो ठीक है लेकिन यहाँ तो दीवाने ही दीवाने हैं और सारे दर्शकों को दीवाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं ।

थोड़ी सांस ले लो भाई नहीं तो सांस फूल जाएगी पिपनी बजाते बजाते । चिंता मत करिए शादी पर बाजा बजाने का मौका फिर मिलने वाला है जल्दी ही । नेपाल के अपने भाइयों को जगाइए ................ मनीषा कोइराला ने भी घोषणा कर दी है !!!!!